नवरात्रि के 9 दिन - देवी पूजा, आरती, महत्व और शुभ खरीदारी Skip to content
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नवरात्रि के 9 दिन: किस दिन किस देवी की पूजा करें, आरती, महत्व और शुभ खरीदारी

नवरात्रि के 9 दिन

नवरात्रि की पूजा आरती के बिना अधूरी मानी जाती है। शारदीय नवरात्रि 2026 रविवार, 11 अक्टूबर से शुरू हो रही है और 20 अक्टूबर को दशहरा के साथ पूरी होगी। इन नौ दिनों में हर दिन मां दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा होती है और पूजा के अंत में आरती की जाती है।

अगर आप जानना चाहते हैं कि aarti for navratri कब और कैसे करें, तो सीधा जवाब यह है: दिन की देवी की पूजा करें, उन्हें भोग लगाएं, फिर दीपक और कपूर से आरती उतारें। इसके बाद परिवार के साथ प्रसाद लें।

इस लेख में आपको नौ दिन की नौ देवियां, उनकी पूजा, भोग और मंत्र मिलेंगे। साथ में “ॐ जय अम्बे गौरी” की पूरी आरती, दुर्गा चालीसा, जौ बोने की विधि, व्रत के नियम, शुभ खरीदारी और पूजा के समापन की जानकारी भी है।

नवरात्रि में आरती का क्या महत्व है?

आरती पूजा का आखिरी और सबसे भावपूर्ण हिस्सा है। इसमें दीपक घुमाकर देवी का स्वागत और धन्यवाद किया जाता है। मान्यता है कि आरती से पूजा की कमियां पूरी हो जाती हैं।

नवरात्रि की पूजा में आरती क्यों की जाती है?

पूजा में मंत्र या विधि में कोई चूक हो जाए, तब भी आरती श्रद्धा से की जाए तो पूजा पूर्ण मानी जाती है। इसी वजह से नवरात्रि में आरती का इतना महत्व है। ज्यादातर घरों में नवरात्रि की आरती सुबह और शाम दोनों समय होती है।

आरती करने का सही समय

  • सुबह: स्नान, पूजा और भोग के बाद, अक्सर सूर्योदय के कुछ समय बाद।
  • शाम: सूर्यास्त के आसपास, दीपक जलाने के समय।
  • विशेष दिन: अष्टमी और नवमी पर हवन के बाद भी आरती की जाती है।

परिवार की परंपरा के अनुसार समय थोड़ा आगे-पीछे हो सकता है। नवरात्रि में आरती का कोई एक तय घंटा नहीं है। श्रद्धा और नियमितता ज्यादा मायने रखती है।

नवरात्रि में आरती कैसे करें?

  1. पूजा स्थान साफ करें और दीपक में घी डालकर बाती जलाएं।
  2. थाली में दीपक, कपूर, रोली, अक्षत और फूल रखें।
  3. घंटी बजाते हुए थाली को देवी के सामने गोल घुमाएं। आमतौर पर यह चरणों से शुरू होकर मुख तक और फिर पूरे स्वरूप पर घुमाई जाती है।
  4. आरती के बाद थाली पर हाथ फेरकर आंखों और सिर से लगाएं।
  5. प्रसाद बांटें।

नवरात्रि के दौरान पूजा-पाठ और शुभ खरीदारी के लिए सही समय जानने हेतु आज का चौघड़िया मुहूर्त देखें और अपने शुभ कार्यों की शुरुआत उचित समय पर करें।

Navratri Aarti in Hindi और आरती के बोल का महत्व

बहुत से लोग Navratri Aarti in Hindi खोजते हैं, ताकि पूरी आरती सही शब्दों में गा सकें। इसी वजह से इस लेख में आगे पूरी आरती दी गई है। बोल पढ़कर गाना अच्छा है, पर भाव उससे ज्यादा जरूरी है। हर आरती में देवी का स्वरूप, उनकी शक्ति और भक्त की प्रार्थना होती है।

नवरात्रि के 9 दिन, नौ देवियां और उनकी आरती

नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूप, यानी नवदुर्गा, पूजे जाते हैं। नीचे तालिका में पूरा क्रम देखिए।

दिनदेवीआम तौर पर चढ़ाया जाने वाला भोग
पहलामां शैलपुत्रीदेसी घी
दूसरामां ब्रह्मचारिणीशक्कर या मिश्री
तीसरामां चंद्रघंटादूध या खीर
चौथामां कूष्मांडामालपुआ
पांचवांमां स्कंदमाताकेला
छठामां कात्यायनीशहद
सातवांमां कालरात्रिगुड़
आठवांमां महागौरीनारियल या हलवा-चना
नौवांमां सिद्धिदात्रीतिल, हलवा-पूरी

भोग की परंपराएं क्षेत्र और परिवार के अनुसार बदलती हैं। इन्हें मार्गदर्शन की तरह लें।

हर दिन की पूजा के बाद देवी जी की आरती के रूप में दुर्गा जी की मुख्य आरती “ॐ जय अम्बे गौरी” गाई जाती है। इसके पूरे बोल इसी लेख में आगे दिए गए हैं। कई घरों में पहले उस दिन की देवी की आरती भी होती है। चाहें तो सिर्फ मुख्य आरती से भी पूजा पूरी कर सकते हैं।

पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा और आरती

महत्व: पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। इन्हें शक्ति और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। पहले दिन घटस्थापना के बाद इन्हीं की पूजा होती है।

पूजा विधि और भोग: देवी को सफेद फूल और देसी घी का भोग चढ़ाएं। मंत्र: ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।

First Navratri Aarti: पूजा के बाद नीचे दी गई पूरी “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। Navratri Day 1 Aarti के रूप में यही सबसे ज्यादा प्रचलित है। थाली घुमाते हुए देवी के वृषभ पर सवार रूप और स्थिरता की प्रार्थना का भाव मन में रखें।

पहला दिन: मां शैलपुत्री

दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा और आरती

देवी का स्वरूप और महत्व: ये तपस्या और संयम की देवी हैं। इनके एक हाथ में माला और दूसरे में कमंडल बताया जाता है। विद्यार्थी और साधक इनसे धैर्य की प्रार्थना करते हैं।

पूजा विधि और भोग: शक्कर या मिश्री का भोग लगाएं और सफेद या हल्के रंग के फूल चढ़ाएं। मंत्र: ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः।

आरती: पूजा के बाद नीचे दी गई “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। इस दिन तप, त्याग और साधना का भाव मन में रखें। इसे शांत मन और धीमे स्वर में गाना अच्छा माना जाता है।

दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी

तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा की पूजा और आरती

देवी का महत्व: माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र होने से इनका यह नाम है। इन्हें साहस और निर्भयता का रूप माना जाता है। वाहन सिंह बताया जाता है।

पूजा विधि और भोग: दूध या खीर का भोग लगाएं। मंत्र: ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः।

आरती: पूजा के बाद नीचे दी गई “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। घंटी बजाना इस दिन विशेष रूप से अच्छा माना जाता है। देवी की वीरता और भक्तों के भय हरने का भाव याद रखें।

तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा की पूजा और आरती

चौथा दिन: मां कूष्मांडा की पूजा और आरती

देवी का महत्व: मान्यता है कि इन्होंने अपनी मंद मुस्कान से सृष्टि रची। इन्हें सृजन और ऊर्जा से जोड़ा जाता है। इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है।

पूजा विधि और भोग: मालपुआ का भोग प्रचलित है। मंत्र: ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः।

आरती: पूजा के बाद नीचे दी गई “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। भक्त इस दिन घर में सुख और ऊर्जा की प्रार्थना करते हैं।

चौथा दिन: मां कूष्मांडा की पूजा और आरती

पांचवां दिन: मां स्कंदमाता की पूजा और आरती

देवी का महत्व: भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने से इनका यह नाम है। ये गोद में बालक स्कंद को लिए कमल के आसन पर विराजमान दिखाई जाती हैं। इन्हें मातृत्व और संरक्षण का रूप माना जाता है।

पूजा विधि और भोग: केले का भोग चढ़ाएं। मंत्र: ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः।

आरती: पूजा के बाद नीचे दी गई “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। माताएं इस दिन बच्चों के सुख की प्रार्थना विशेष रूप से करती हैं।

पांचवां दिन: मां स्कंदमाता की पूजा और आरती

छठा दिन: मां कात्यायनी की पूजा और आरती

देवी का महत्व: ऋषि कात्यायन की पुत्री के रूप में प्रकट होने से ये कात्यायनी कहलाईं। इन्हें साहस और शक्ति का रूप माना जाता है। हाथ में तलवार और कमल बताए जाते हैं।

पूजा विधि और भोग: शहद का भोग लगाएं। मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः।

आरती: पूजा के बाद नीचे दी गई “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। कई क्षेत्रों में अविवाहित कन्याएं इस दिन विशेष पूजा करती हैं।

छठा दिन: मां कात्यायनी की पूजा और आरती

सातवां दिन: मां कालरात्रि की पूजा और आरती

देवी का महत्व: यह देवी का उग्र रूप है। मान्यता है कि इनकी उपासना से भय दूर होता है। इन्हें गर्दभ (गधे) पर सवार और काले वर्ण का बताया जाता है। नाम डरावना लगता है, पर इन्हें शुभ फल देने वाली भी माना जाता है।

पूजा विधि और भोग: गुड़ या गुड़ से बने पकवान का भोग लगाएं। मंत्र: ॐ देवी कालरात्र्यै नमः।

आरती: पूजा के बाद नीचे दी गई “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। अंधकार और बुराई को मिटाने वाली शक्ति का भाव मन में रखें। दीपक की लौ का ध्यान रखें और आरती शांत भाव से करें।

सातवां दिन: मां कालरात्रि की पूजा और आरती

आठवां दिन: मां महागौरी की पूजा और आरती

देवी का महत्व: इन्हें शांति और पवित्रता का रूप माना जाता है। गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र और बैल की सवारी इनकी पहचान बताई जाती है। अष्टमी पर कई परिवार कन्या पूजन करते हैं।

पूजा विधि और भोग: नारियल या हलवा-चना का भोग चढ़ाएं। मंत्र: ॐ देवी महागौर्यै नमः।

आरती: पूजा के बाद नीचे दी गई “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। अष्टमी पर हवन करने वाले परिवार हवन के बाद आरती करते हैं।

अष्टमी पूजा और कन्या पूजन: अष्टमी पर नौ कन्याओं को घर बुलाकर उनके पैर धोएं, तिलक लगाएं और हलवा-पूरी-चने का प्रसाद खिलाएं। कई घर नवमी पर यह पूजन करते हैं, जो परिवार की परंपरा पर निर्भर है।

आठवां दिन: मां महागौरी की पूजा और आरती

नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री की पूजा और आरती

देवी का महत्व: ये सिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की देवी मानी जाती हैं। इन्हें कमल के आसन पर विराजमान बताया जाता है।

पूजा विधि और भोग: तिल, हलवा और पूरी का भोग प्रचलित है। मंत्र: ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।

आरती: पूजा के बाद नीचे दी गई “ॐ जय अम्बे गौरी” आरती गाएं। यह नवरात्रि की आखिरी आरती है, जिसमें नौ दिन की पूजा के लिए धन्यवाद का भाव रहता है। इसके बाद नवमी पर हवन और कन्या पूजन की परंपरा निभाई जाती है।

नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री की पूजा और आरती

नवरात्रि की आरती (Navratri Aarti Lyrics): पूरी आरती और दुर्गा चालीसा

नवरात्रि में सबसे ज्यादा गाई जाने वाली navratri ki aarti है “ॐ जय अम्बे गौरी”। हर दिन की देवी की पूजा के बाद यही navratri durga aarti गाई जाती है, इसलिए नीचे पूरी आरती दी गई है।

अगर आप navratri aarti lyrics या navratri aarti in hindi खोज रहे हैं, तो नीचे दिए बोल सीधे पढ़कर गा सकते हैं। यह navratri mata ki aarti का सबसे प्रचलित रूप है, और इसकी रचना के अंत में शिवानंद स्वामी का नाम आता है।

ॐ जय अम्बे गौरी: दुर्गा माता की पूरी आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
तुम को निशदिन ध्यावत
तुम को निशदिन ध्यावत
हरि ब्रह्मा शिवरी
ॐ जय अम्बे गौरी

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को
मैया टीको मृगमद को
उज्जवल से दोउ नैना
उज्जवल से दोउ नैना
चन्द्रबदन नीको
ॐ जय अम्बे गौरी

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजे
मैया रक्ताम्बर राजे
रक्त पुष्प दल माला
रक्त पुष्प दल माला
कंठन पर साजे
ॐ जय अम्बे गौरी

केहरि वाहन राजत खड़्ग खप्पर धारी
मैया खड़्ग खप्पर धारी
सुर-नर मुनिजन सेवत
सुर-नर मुनिजन सेवत
तिनके दुखहारी
ॐ जय अम्बे गौरी

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती
मैया नासाग्रे मोती
कोटिक चन्द्र दिवाकर
कोटिक चन्द्र दिवाकर
राजत सम ज्योति
ॐ जय अम्बे गौरी

शुम्भ निशुम्भ विडारे, महिषासुर धाती
मैया महिषासुर धाती
धूम्र विलोचन नैना
धूम्र विलोचन नैना
निशदिन मदमाती
ॐ जय अम्बे गौरी

चण्ड मुण्ड संहारे, सोणित बीज हरे
मैया सोणित बीज हरे
मधु कैटभ दोऊ मारे
मधु कैटभ दोऊ मारे
सुर भयहीन करे
ॐ जय अम्बे गौरी

ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी
मैया तुम कमला रानी
आगम निगम बखानी
आगम निगम बखानी
तुम शिव पटरानी
ॐ जय अम्बे गौरी

चौसठ योगिनी मंगल, नृत्य करत भैरों
मैया नृत्य करत भैरों
बाजत ताल मृदंगा
बाजत ताल मृदंगा
अरु बाजत डमरु
ॐ जय अम्बे गौरी

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भर्ता
मैया तुम ही हो भर्ता
भक्तन की दुःख हरता
भक्तन की दुःख हरता
सुख सम्पत्ति कर्ता
ॐ जय अम्बे गौरी

भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी
मैया वर मुद्रा धारी
मनवांछित फ़ल पावत
मनवांछित फ़ल पावत
सेवत नर-नारी
ॐ जय अम्बे गौरी

कंचन थार विराजत, अगर कपूर बाती
मैया अगर कपूर बाती
श्रीमालकेतु में राजत
श्रीमालकेतु में राजत
कोटि रत्न ज्योति
ॐ जय अम्बे गौरी

श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे
मैया जो कोई नर गावे
कहत शिवानंद स्वामी
कहत शिवानंद स्वामी
सुख संपत्ति पावे
ॐ जय अम्बे गौरी

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
तुम को निशदिन ध्यावत
तुम को निशदिन ध्यावत
हरि ब्रह्मा शिवरी
ॐ जय अम्बे गौरी
ॐ जय अम्बे गौरी
ॐ जय अम्बे गौरी

नवरात्रि की आरती कब और कैसे गाएं?

आरती हमेशा पूजा और भोग के बाद गाई जाती है। थाली में दीपक, कपूर और फूल रखें, घंटी बजाते हुए थाली घुमाएं और पूरी आरती गाएं। यही aarti navratri की सबसे सरल और पूरी विधि है।

अम्बे तू है जगदम्बे काली: एक और लोकप्रिय आरती

नवरात्रि में “अम्बे तू है जगदम्बे काली” नाम की आरती भी बहुत गाई जाती है। इसमें देवी के काली और खप्पर वाली रूप का गुणगान है, और भक्त मां से अपने संकट हरने की प्रार्थना करते हैं। 

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली ।
तेरे ही गुण गाये भारती,
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥

तेरे भक्त जनो पर,
भीर पडी है भारी माँ ।
दानव दल पर टूट पडो,
माँ करके सिंह सवारी ।
सौ-सौ सिंहो से बलशाली,
अष्ट भुजाओ वाली,
दुष्टो को पलमे संहारती ।
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली ।
तेरे ही गुण गाये भारती,
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥

माँ बेटे का है इस जग मे,
बडा ही निर्मल नाता ।
पूत – कपूत सुने है पर न,
माता सुनी कुमाता ॥


सब पे करूणा दरसाने वाली,
अमृत बरसाने वाली,
दुखियो के दुखडे निवारती ।
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली ।
तेरे ही गुण गाये भारती,
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥

नही मांगते धन और दौलत,
न चांदी न सोना माँ ।
हम तो मांगे माँ तेरे मन मे,
इक छोटा सा कोना ॥


सबकी बिगडी बनाने वाली,
लाज बचाने वाली,
सतियो के सत को सवांरती ।
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली ।
तेरे ही गुण गाये भारती,
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥


चरण शरण मे खडे तुम्हारी,
ले पूजा की थाली ।
वरद हस्त सर पर रख दो,
मॉ सकंट हरने वाली ।
मॉ भर दो भक्ति रस प्याली,
अष्ट भुजाओ वाली,
भक्तो के कारज तू ही सारती ।
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली ।
तेरे ही गुण गाये भारती,
ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥

दुर्गा चालीसा: नवरात्रि में पाठ की परंपरा

कई घरों में आरती से पहले या बाद में दुर्गा चालीसा का पाठ होता है। इसके अंत में देवीदास का नाम आता है। पाठ से पहले दीपक जलाएं और शांत मन से बैठें।

॥ दुर्गा चालीसा ॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी
निरंकार है ज्योति तुम्हारी
तिहूं लोक फैली उजियारी
शशि ललाट मुख महाविशाला
नेत्र लाल भृकुटी विकराला
रूप मातु को अधिक सुहावे
दरश करत जन अति सुख पावे
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

तुम संसार शक्ति लै कीना
पालन हेतु अन्न धन दीना
अन्नपूर्णा हुई जग पाला
तुम ही आदि सुन्दरी बाला
प्रलयकाल सब नाशन हारी
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

रुप सरस्वती का तुम धारा
दे सुबुद्धि ॠषि मुनिन उबारा
धरा रूप नरसिंह को अम्बा
प्रकट भई फाडकर खम्बा
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं
श्री नारायण अंग समाहीं
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

क्षीरसिन्धु में करत विलासा
दयासिन्धु दीजै मन आसा
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी
महिमा अमित न जात बखानी
मातंगी धूमावति माता
भुवनेश्वरि बगला सुखदाता
श्री भैरव तारा जग तारिणि
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणि
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

केहरि वाहन सोह भवानी
लांगुर वीर चलत अगवानी
कर में खप्पर खड्ग विराजे
जाको देख काल डर भागे
सोहे कर अस्त्र और त्रिशूला
जाते उठत शत्रु हिय शुला
नगरकोट में तुम्हीं विराजत
तिहूं लोक में डंका बाजत
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे
रक्तबीज शंखन संहारे
महिषासुर नृप अति अभिमानी
जेहि अघ भार मही अकुलानी
रूप कराल कालिका धारा
सैन्य सहित तुम तिहि संहारा
परी भीर संतन पर जब जब
भई सहाय मातु तुम तब तब
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

अमरपूरी अरू बासव लोका
तब महिमा सब कहें अशोका
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी
तुम्हें सदा पूजें नर नारी
प्रेम भक्ति से जो यश गावे
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई
जन्म मरण ते सो छुटि जाई
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी
योग न हो बिन शक्ति तुम्हरी
शंकर आचारज तप कीनो
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को
काहु काल नहीं सुमिरो तुमको
शक्ति रूप को मरम न पायो
शक्ति गई तब मन पछतायो
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

शरणागत हुई कीर्ति बखानी
जय जय जय जगदंब भवानी
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा
दई शक्ति नहिं कीन विलंबा
मोको मातु कष्ट अति घेरो
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो
आशा तृष्णा निपट सतावें
रिपु मूरख मोहे अति दर पावे
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

शत्रु नाश कीजै महारानी
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी
करो कृपा हे मातु दयाला
ॠद्धि सिद्धि दे करहु निहाला
जब लगि जिऊं दया फल पाऊं
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं
दुर्गा चालीसा जो गावै
सब सुख भोग परम पद पावै
देवीदास शरण निज जानी
करहु कृपा जगदम्ब भवानी
(नमो-नमो, नमो-नमो)
(नमो-नमो, नमो-नमो)

नवरात्रि में जौ क्यों बोए जाते हैं?

जौ को पहली फसल और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कलश स्थापना के साथ जौ बोना नई शुरुआत और अन्न के सम्मान का भाव दिखाता है।

जौ बोने की विधि:

  1. चौड़ा मिट्टी का पात्र लें और उसमें साफ मिट्टी भरें।
  2. जौ को कुछ घंटे भिगोकर मिट्टी पर फैलाएं और ऊपर हल्की मिट्टी डालें।
  3. बीच में कलश स्थापित करें।
  4. रोज हल्का पानी छिड़कें। पात्र को तेज सीधी धूप से बचाएं, पर हल्की रोशनी में रखें।

मान्यता है कि जौ का हरा-भरा उगना शुभ संकेत है। पर इसे भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी न समझें। जौ का बढ़ना मिट्टी, पानी, मौसम और रोशनी पर निर्भर करता है।

अष्टमी या नवमी के बाद जौ को बहते जल में प्रवाहित करें, या किसी गमले, बगीचे या पेड़ की जड़ में डाल दें। कूड़े में न फेंकें।

नवरात्रि में राशि के अनुसार क्या खरीदें?

राशि के अनुसार खरीदारी एक ज्योतिषीय मान्यता है, कोई तय नियम नहीं। नीचे के सुझाव आम तौर पर प्रचलित मान्यताओं पर आधारित हैं। अपनी आस्था और जरूरत के हिसाब से ही खरीदें, और जरूरत पड़े तो किसी भरोसेमंद ज्योतिषी से पूछ लें।

मेष से कर्क राशि के लिए खरीदारी के सुझाव

  • मेष: लाल चुनरी, तांबे का दीपक
  • वृषभ: सफेद फूल, चांदी की कोई छोटी वस्तु
  • मिथुन: हरे रंग की पूजा सामग्री या पौधा
  • कर्क: चांदी का सिक्का या सफेद वस्त्र

सिंह से वृश्चिक राशि के लिए खरीदारी के सुझाव

  • सिंह: तांबे या सुनहरे रंग का दीपक
  • कन्या: हरे रंग की सजावट या तुलसी का पौधा
  • तुला: सफेद मिठाई, इत्र या चांदी की वस्तु
  • वृश्चिक: लाल चुनरी और लाल फूल

धनु से मीन राशि के लिए खरीदारी के सुझाव

  • धनु: पीले फूल, हल्दी या पीले वस्त्र
  • मकर: मिट्टी के दीपक और सादी पूजा सामग्री
  • कुंभ: पूजा की किताब या दीपक
  • मीन: पीली मिठाई या पीला कपड़ा

सबसे सरल और सुरक्षित विकल्प वही हैं जो हर राशि के लिए चलते हैं: पूजा सामग्री, लाल चुनरी, दीपक और अपनी क्षमता के अनुसार कोई छोटी चांदी या सोने की वस्तु।

नवरात्रि में कौन-सी चीजें खरीदना शुभ माना जाता है?

नवरात्रि में पूजा सामग्री, देवी की चुनरी, मिट्टी के दीपक और कलश खरीदना शुभ माना जाता है। लोग सोना-चांदी, नए बर्तन या घर की जरूरत का सामान भी इन दिनों में लेते हैं।

  • पूजा सामग्री और देवी की चुनरी
  • मिट्टी के दीपक और कलश
  • सोना-चांदी या अन्य उपयोगी वस्तुएं
  • नए कपड़े या घर का जरूरी सामान

शुभ खरीदारी की तिथि और समय के लिए अपना स्थानीय पंचांग देखें। सबसे अच्छी सलाह यह है कि आप वही चीज खरीदें जिसकी आपको सच में जरूरत है। बजट से बाहर जाकर मान्यता के नाम पर खरीदारी करना जरूरी नहीं है।

नवरात्रि व्रत में क्या करें और क्या न करें?

नवरात्रि का व्रत सात्विक भोजन, नियम और संयम से रखा जाता है। इसमें स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।

क्या करें:

  • सात्विक भोजन करें, जैसे फल, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा (यदि परंपरा में हो), साबूदाना, मखाना, दूध-दही।
  • सेंधा नमक का उपयोग करें।
  • दिन भर पर्याप्त पानी पिएं।
  • रोज पूजा और नवरात्रि व्रत की आरती करें।

क्या न करें:

  • अनाज, प्याज और लहसुन से दूरी रखें, यदि आपकी परंपरा में ऐसा नियम है।
  • मांसाहार और शराब से परहेज करें।
  • बिना जरूरत के भारी तला-भुना खाना न खाएं।

अगर आप दवाइयां लेते हैं या आपको कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो दवाई या जरूरी भोजन बिना डॉक्टर की सलाह के न छोड़ें। चक्कर या कमजोरी लगे तो व्रत में ढील दें। देवी भक्ति में स्वास्थ्य की अनदेखी जरूरी नहीं है।

नवरात्रि की पूजा का समापन कैसे करें?

पूजा का समापन अष्टमी और नवमी की पूजा, कन्या पूजन, हवन और कलश-जौ के विसर्जन से होता है। पूरा क्रम आपकी पारिवारिक परंपरा के अनुसार चलता है।

  1. अष्टमी या नवमी की पूजा: मां महागौरी या मां सिद्धिदात्री की पूजा करें और आरती उतारें।
  2. कन्या पूजन: कन्याओं को भोजन कराएं, तिलक लगाएं और उपहार दें।
  3. हवन: परंपरा हो, तो हवन करके पूर्णाहुति दें।
  4. कलश और जौ का विसर्जन: कलश का जल घर में छिड़कें या पौधों में डालें। जौ बहते जल में प्रवाहित करें या मिट्टी में डालें।
  5. व्रत का पारण: दशमी पर सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

इस बार अष्टमी और नवमी की तिथि पंचांग में पास-पास पड़ सकती है। अपने शहर के पंचांग से सही दिन पक्का कर लें।

Navratri Aarti: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नवरात्रि की आरती कब करनी चाहिए?

पूजा और भोग के बाद, सुबह और शाम दोनों समय। यह परिवार की परंपरा पर भी निर्भर करता है।

2. नवरात्रि के पहले दिन किस देवी की पूजा होती है?

पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा और आरती होती है।

3. नवरात्रि के 9 दिनों में कौन-कौन सी देवियां पूजी जाती हैं?

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।

4. नवरात्रि में जौ क्यों बोए जाते हैं?

जौ को समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह धार्मिक मान्यता है।

5. नवरात्रि में कौन-सी खरीदारी शुभ मानी जाती है?

पूजा सामग्री, चुनरी, दीपक, कलश और सोना-चांदी। तिथि के लिए स्थानीय पंचांग देखें।

6. क्या सभी नौ दिनों में अलग-अलग आरती की जाती है?

कई घरों में हर दिन की देवी की अलग आरती होती है। कुछ परिवार रोज केवल मुख्य दुर्गा आरती “ॐ जय अम्बे गौरी” करते हैं।

निष्कर्ष

नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा, आरती और संयम का समय हैं। शारदीय नवरात्रि 2026 में यह क्रम 11 अक्टूबर से शुरू होकर दशहरा तक चलेगा।

पूजा की तिथि, मुहूर्त और अष्टमी-नवमी का दिन शहर के हिसाब से बदल सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार ही पूजा करें।

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